राहुल सांकृत्यायन, प्रभा (७)
Rahul Sankrityayan, (राहुल सांकृत्यायन). 1942. वोल्गा से गंगा [From the Volga to the Ganges]. इलाहाबाद [Allahabad]: किताब महल [Kitab Mahal]. “प्रभा” [“Prabha” / “Radiance”], section 7, pp. 200–203.
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(७)
एक बड़ा आँगन है, जिसके चारों ओर बराम्दा और पीछे तितल्ले मकान की कोठरियाँ हैं। बराम्दों में अरगनों पर पीले वस्त्र सूख रहे हैं। आँगन के एक कोने में एक कुआँ तथा पास ही एक स्नान-कोष्ठक है। आँगन की दूसरी जगहों में कितने ही वृक्ष हैं, जिनमें एक पीपल का है। पीपल के गिर्द वेदी है और फिर हटकर पत्थर का कटघरा, जिस पर हज़ारों दीपकों के रखने के लिए स्थान बने हुए हैं। प्रभा ने घुटने टेक उस सुन्दर
वृक्ष की वन्दना करके कहा—“प्रिय, इसी जाति का वह वृक्ष था, जिसके नीचे बैठकर सिद्धार्थ गौतम ने अपने प्रयत्न, अपने चिन्तन द्वारा मन की भ्रान्तियों को हटा बोध प्राप्त किया, और तबसे वह बुद्ध के नाम से प्रख्यात हुए। सिर्फ़ उसी मधुर स्मृति के लिए हम इस जाति के वृक्षों के सामने सिर झुकाते हैं।”
“अपने प्रयत्न, अपने चिन्तन द्वारा मन की भ्रान्तियों को हटा बोध प्राप्त करने का प्रतीक। ऐसे प्रतीक की पूजा होनी चाहिए, प्रिये। ऐसे प्रतीक की पूजा अपने प्रयत्न—आत्म-विजय—की पूजा है।”
फिर दोनों भदन्त धर्मरक्षित के पास गए। वह उस वक्त आँगन के एक वकुल वृक्ष के नीचे बैठे थे, जहाँ नवपुष्पित फूलों की मधुर सुगन्धि फैल रही थी। प्रभा ने बौद्ध-उपासिका की भाँति पंच-प्रतिष्ठित से (पैरों के दोनों पंजों-घुटनों, हाथ की दोनों हथेलियों और ललाट को धरती पर रखकर) वन्दना की। अश्वघोष ने खड़े ही खड़े सम्मान प्रदर्शन किया। फिर दोनों ज़मीन पर पड़े चर्म-खण्डों को लेकर बैठ गए। भदन्त के शिष्य अश्वघोष को बातचीत करने के लिए आया समझ वहाँ से हट गए। साधारण शिष्टाचार की बातों के बाद अश्वघोष ने दर्शन की बात छेड़ी।धर्मरक्षित ने कहा—“ब्राह्मण-कुमार, दर्शन को भी बुद्धों—ज्ञानियों—के धर्म में बन्धन और भारी बन्धन (दृष्टि-संयोजन) कहा गया है।”
“तो भदन्त, क्या बुद्ध के धर्म में दर्शन का स्थान नहीं है?”
“स्थान क्यों नहीं, बुद्ध का धर्म दर्शनमय है; किन्तु बुद्ध उसे बेड़े की भाँति पार उतरने के लिए बताते हैं, सिर पर उठाकर ढोने के लिए नहीं।”
“क्या कहा, बेड़े की भाँति?”
“हाँ, बिना नाववाली नदी में लोग बेड़ा बाँधकर उससे पार उतर जाते हैं; किन्तु पार उतरकर बेड़े की उन लकड़ियों को उपकारी समझ सिर पर ढोते नहीं फिरते।”
अपने धर्म के लिए भी जिस पुरुष को इतना कहने की हिम्मत थी, उसने ज़रूर सत्य और उसके बल को देखा होगा। भदन्त, बुद्ध के दर्शन
की कोई ऐसी बात बतलायें, जिसके जानने से हमें अपने मन से भी बहुत-सा समझ जाने में सुभीता हो।”
“अनात्मवाद है, कुमार। ब्राह्मण आत्मा को नित्य, ध्रुव, शाश्वत तत्त्व मानते हैं। बुद्ध जगत के भीतर-बाहर किसी ऐसे नित्य, ध्रुव, शाश्वत तत्त्व को नहीं मानते, इसलिए उनके दर्शन को अनात्मवाद—अनित्यता, क्षण-क्षण उत्पत्ति-विनाश—का दर्शन कहते हैं।”
“मेरे लिए यह एक बात ही काफ़ी है, भदन्त। बेड़े की भाँति धर्म तथा अनात्मवाद की घोषणा करनेवाले बुद्ध को अश्वघोष शतशः प्रणाम करता है। अश्वघोष जिसको ढूँढ़ता था, उसे उसने पा लिया। मैं अपने भीतर अनुभव कर रहा था कुछ ऐसी ही लहरों को; किन्तु मैं उसे नाम नहीं दे पाता था। आज बुद्ध की शिक्षाओं को लोगों ने ठीक से माना होता, तो दुनिया दूसरी ही होती।”
“ठीक कहा, कुमार। हमारे यवन देश में भी महान् दार्शनिक पैदा हुए हैं, जिनमें पिथागोर, हेराक्लितु तो भगवान् के समय जीवित थे; सुकरात, देमोक्रितु, अफ़लातून, अरस्तू उनसे थोड़ा बाद में हुए। इन यवन दार्शनिकों ने गम्भीर चिन्तन किया; किन्तु हेराक्लितु को छोड़ सभी शाश्वतवाद—नित्यतावाद—से ऊपर नहीं उठ सके। वर्तमान का उन्हें हृदय से ज़्यादा मोह था। यही कारण था कि वह भविष्य को भी उससे बाँध रखना चाहते थे। हेराक्लितु अवश्य बुद्ध की भाँति जगत को किसी दो क्षण भी वैसा ही नहीं मानता था; किन्तु इसमें उसका एक वैयक्तिक स्वार्थ था।”
“दर्शन-विचार में वैयक्तिक स्वार्थ?”
“पेट सभी के पास होता है, कुमार। उस वक्त हमारे एथेन्स नगर में गण—बिना राजा का राज्य—था। पहले हेराक्लितु के परिवार की तरह के बड़े-बड़े सामन्त गण-शासन के सूत्रधार थे, पीछे उनको हटाकर व्यापारियों—सेठों—ने शासन-सूत्र अपने हाथ में लिया। इस अवस्था में
हेराक्लितु असन्तुष्ट था। वह परिवर्तन चाहता था; किन्तु आगे जाने के लिए नहीं, बल्कि पीछे की ओर लौटने के लिए।”
“हमें परिवर्तन चाहिए; किन्तु आगे बढ़ने के लिए, पीछे लौटने के लिए नहीं; मैं समझता हूँ, भदन्त, अतीत मुर्दा है।”
“बिल्कुल ठीक कहा, कुमार। बुद्ध परिवर्तन चाहते थे, और बेहतर जगत को लाने के लिए भिक्षु-संघ को उन्होंने उसी भविष्य के जगत के लिए एक नमूने के तौर पर पेश किया।”
“जहाँ जात-पाँत नहीं, जहाँ ऊँच-नीच नहीं।”
“जहाँ सबके लिए भोग समान है, जहाँ सबके लिए सेवा करना समान है। तुमने हमारे महास्थविर धर्मसेन को बाहर झाड़ लगाते देखा होगा?”
“वह काले-काले?”
“हाँ, वह हममें सबसे श्रेष्ठ हैं। हम रोज़ पंच-प्रतिष्ठित से उनकी वन्दना करते हैं। सारे कोसल-देश के भिक्षु-संघ के वह नायक हैं।”
“सुना है, वह चण्डाल-कुल के हैं?”
“भिक्षु-संघ कुल नहीं देखता, कुमार, वह गुण देखता है। वह अपनी विद्या और अपने गुणों से हमारे नायक हैं, हमारे पिता हैं। उनके भिक्षा-पात्र में यदि पात्र चुपड़ने भर की भी कोई चीज़ मिल जाती है, तो वह बिना साथियों को दिए नहीं खाते। यही बुद्ध की शिक्षा है। पहनने के तीन कपड़ों, मिट्टी के भिक्षा-पात्र, सुई, जलडुक्का, अस्तुरा और कमरबन्द के सिवाय हमारी सारी चीज़ें संघ की हैं। यह घर, वारा, मंच, पीठ आदि सब संघ के हैं। हमारे किसी-किसी विहार में खेत भी, वह भी संघ के हैं। संघ देख-सुनकर एक आदमी को भिक्षु बनाता है; किन्तु जो संघ में प्रविष्ट हो गया—भिक्षु बन गया—वह सबके समान है।”
“इस तरह का संघ यदि सारे देश के लिए बनता?”
“वह कैसे हो सकता है, कुमार। राजा और धनी कब दूसरों को बराबर होने देंगे। भिक्षुओं ने एक दास को संघ में दाख़िल कर लिया था।
संघ में दाख़िल होते ही वह अदास—सबके समान था; किन्तु जिसका वह दास था, उसने हल्ला मचाना शुरू किया। दूसरे दास-स्वामी भी उसके साथ शामिल हो गए। राजा स्वयं हज़ारों दासों के स्वामी होते हैं। वह भी अपनी सम्पत्ति पर इस तरह का प्रहार कैसे सह सकते। बुद्ध क्या करते, उन्होंने वचन दिया कि आगे से संघ दास को अपने भीतर नहीं लेगा। हमारा संघ विषमतापूर्ण समुद्र में एक छोटा-सा द्वीप है, इसीलिए वह सुरक्षित नहीं है, जब तक कि संसार में इस तरह की गरीबी, इस तरह की दासता है।”
